नीचे की ओर जाना श्रेष्ठता का परम लक्षण है , क्योंकि नीचे जाने को वही राजी हो सकता है जिसकी श्रेष्ठता इतनी सुनिश्चित है कि नीचे जाने पर नष्ट नही होती है । ऊपर वही जाने को उत्सुक होता है जिसे पता है कि अगर वह नीचे रहा तो निकृष्ट समझा जाएगा । ऊपर की ओर जाने के लिए होड़ लगी है इसके विपरीत नीचे जाने में कोई होड़ नही , कोई संघर्ष नही है , पर वहा जाने को कोई राजी नही है। नीचे की ओर जाना आन्तरिक श्रेष्ठता है।
रविवार, 14 फ़रवरी 2010
शनिवार, 13 फ़रवरी 2010
माँ
'माँ'- शब्द जिसकी ध्वनि कर्ण-कुहर में प्रवेश करते ही ऐसी अनुभूति होती है जैसे कानो में मधु की मधुरता घुल गई हो,इस शब्द का उच्चारण करने में भी जैसे ध्वनि- सम्प्रेषण के सभी अवयवो का
एक साथ प्रयोग हो रहा हो..!
नारी चाहे संसार की सकल सिद्धिया प्राप्त करले या समस्त विभूतियों की स्वामिनी बन जाये किन्तु यदि कोई अपनी तुतलाती बोली से उसे माँ कहने वाला नहीं हो तो उसके लिए सब व्यर्थ है, नीरस है...!
इसी लिए तो किसी शायर ने कहा है-
घास पर खेलता एक बच्चा,पास बैठी i माँ मुस्कराती है ...हैरत है मुझे ये देखकर,क्यों दुनिया काबा ओ सोमनाथ जाती है...
कहते है की भगवान स्वयं धरती पर उपस्थित नहीं हो सकते थे इसलिए अपने प्रतिनिधि के रूप में माँ को भेज दिया ...! अपनी संतान की प्रसन्नता के लिए माँ अपने सभी सुखो को त्याग देती है ,और यह सब करते हुए उसे परम आनंदानुभूति होती है ....एक शायर ने इसे यूं कहा है... .......याद आ गयी माँ,
जब देखा मोमबत्ती को पिघलकर रौशनी देते हुए..!! .......
मैंने बहुत पहले एक कव्वाली सुनी थी जिसका सार-संक्षेप कुछ इस तरह से है-
एक युवक, एक युवती के रूप-जाल के आकर्षण में बन्ध कर प्रेम-निवेदन करता है...युवती इसके लिए शर्त रखती है कि यदि वह अपनी माँ का दिल ला कर दे तो अपनी स्वीकृति दे सकती है ...युवक तो जैसे भी संभव हो उसकी स्वीकृति चाहता था....एक पल भी गवाए बिना घर पंहुचा....माँ तो ना जाने कब से उसकी प्रतीक्षा कर रही थी...कहने लगी बेटा बहुत देर हो गयी तुम्हे भूख लगी होगी आओ जल्दी से खाना खा लो ...किन्तु बेटे पर तो जैसे नशा सवार था ...अन्दर से खंजर लाया और भोक दिया माँ की छाती में...और माँ का दिल निकालकर चल पड़ा अपने सपने को पूरा करने ...पेरो में तो जैसे उसके पंख लग गए थे...अचानक ठोकर लगी ...माँ का दिल हाथ से नीचे गिरा और एक आवाज आई ...मेरे बेटे देखू तो तुम्हे कही चोट तो नहीं लगी...पर उसको यह नहीं सुनाई दिया...संभल कर उठा और चल दिया...अपनी महबूबा को अपनी भेट प्रस्तुत कर दी....महबूबा ने उसे कहा-तुम अपनी माँ के नहीं हुए तो मेरे कैसे हो सकते हो....
अंत में.......
* " माँ का प्यार वह उर्जा है जो असंभव को भी संभव बना सकता है!"
*"माँ दुनिया में सबसे अधिक वेतन पाने वाली व्यक्ति है,क्योकि उसे वेतन प्यार के रूप में मिलता है!"
"माँ को ठण्ड लगती है तो वह बच्चो को स्वेटर पहना देती है!"
*"माँ वह बैंक है जहा हम अपने दुःख और तकलीफे जमा कर भूल जाते है और बदले में हमें ब्याज सहित खुशिया मिलती है !"
*"पहली नजर का पहला प्यार होता है...तभी तो हम माँ को पहली बार देखते है और पहला प्यार हो जाता है!"
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एक साथ प्रयोग हो रहा हो..!
नारी चाहे संसार की सकल सिद्धिया प्राप्त करले या समस्त विभूतियों की स्वामिनी बन जाये किन्तु यदि कोई अपनी तुतलाती बोली से उसे माँ कहने वाला नहीं हो तो उसके लिए सब व्यर्थ है, नीरस है...!
इसी लिए तो किसी शायर ने कहा है-
घास पर खेलता एक बच्चा,पास बैठी i माँ मुस्कराती है ...हैरत है मुझे ये देखकर,क्यों दुनिया काबा ओ सोमनाथ जाती है...
कहते है की भगवान स्वयं धरती पर उपस्थित नहीं हो सकते थे इसलिए अपने प्रतिनिधि के रूप में माँ को भेज दिया ...! अपनी संतान की प्रसन्नता के लिए माँ अपने सभी सुखो को त्याग देती है ,और यह सब करते हुए उसे परम आनंदानुभूति होती है ....एक शायर ने इसे यूं कहा है... .......याद आ गयी माँ,
जब देखा मोमबत्ती को पिघलकर रौशनी देते हुए..!! .......
मैंने बहुत पहले एक कव्वाली सुनी थी जिसका सार-संक्षेप कुछ इस तरह से है-
एक युवक, एक युवती के रूप-जाल के आकर्षण में बन्ध कर प्रेम-निवेदन करता है...युवती इसके लिए शर्त रखती है कि यदि वह अपनी माँ का दिल ला कर दे तो अपनी स्वीकृति दे सकती है ...युवक तो जैसे भी संभव हो उसकी स्वीकृति चाहता था....एक पल भी गवाए बिना घर पंहुचा....माँ तो ना जाने कब से उसकी प्रतीक्षा कर रही थी...कहने लगी बेटा बहुत देर हो गयी तुम्हे भूख लगी होगी आओ जल्दी से खाना खा लो ...किन्तु बेटे पर तो जैसे नशा सवार था ...अन्दर से खंजर लाया और भोक दिया माँ की छाती में...और माँ का दिल निकालकर चल पड़ा अपने सपने को पूरा करने ...पेरो में तो जैसे उसके पंख लग गए थे...अचानक ठोकर लगी ...माँ का दिल हाथ से नीचे गिरा और एक आवाज आई ...मेरे बेटे देखू तो तुम्हे कही चोट तो नहीं लगी...पर उसको यह नहीं सुनाई दिया...संभल कर उठा और चल दिया...अपनी महबूबा को अपनी भेट प्रस्तुत कर दी....महबूबा ने उसे कहा-तुम अपनी माँ के नहीं हुए तो मेरे कैसे हो सकते हो....
अंत में.......
* " माँ का प्यार वह उर्जा है जो असंभव को भी संभव बना सकता है!"
*"माँ दुनिया में सबसे अधिक वेतन पाने वाली व्यक्ति है,क्योकि उसे वेतन प्यार के रूप में मिलता है!"
"माँ को ठण्ड लगती है तो वह बच्चो को स्वेटर पहना देती है!"
*"माँ वह बैंक है जहा हम अपने दुःख और तकलीफे जमा कर भूल जाते है और बदले में हमें ब्याज सहित खुशिया मिलती है !"
*"पहली नजर का पहला प्यार होता है...तभी तो हम माँ को पहली बार देखते है और पहला प्यार हो जाता है!"
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बुधवार, 10 फ़रवरी 2010
"यद् भावं तद भवति"
"यद् भावं तद भवति...!" - सूत्र के अनुसार आप जैसा मन में संकल्प करेंगे वैसा ही परिणाम प्राप्त किया जा सकता है ! बस आवश्यकता है तो आपकी जिद की...आपकी प्रतिबद्धता की ...आपके आत्मविश्वास की ...अपनी सम्पूर्ण उर्जा को केंद्रीभूत कर प्रयत्न करने की...प्रयत्न ऐसा कि काम करने में आनंदानुभूति होने लगे... कभी परिस्थितिवश प्रयत्न में लंघन हो जाये तो बार-बार मन में कष्ट का अनुभव हो...!
यदि ऐसा करने की सिद्धता आप की है तो निश्चित मानिये आप जैसा चाहेंगे वैसा ही होने लगेगा...हां यदि कोई आपका आत्मीय आप को इसमें प्रोत्साहित करे तो और भी अच्छा है ... सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हुए ...अपने इष्ट में विश्वास रखकर आगे बढे ....आपके जीवन में चमत्कार घटित होगा...!!! इष्ट में विश्वास यह इसलिए जरुरी है कि भगवान अपने भक्त के संकल्प की पूर्ति के लिए जरुरत होने पर अपना संकल्प तोड़ना पड़े तो तोड़ कर भक्त का संकल्प पूर्ण करने में सहयोग प्रदान करते है...!!!!
रविवार, 7 फ़रवरी 2010
अस्तित्व
शीश झुकने के लिए नहीं, सहर्ष काटने और कटने के लिए है ..
अस्तित्व खरीदने बिकने के लिए नहीं अपने होने को सिद्ध करने के लिए है
हम जिए या मरे यह प्रश्न है व्यर्थ का , हम हारे या जीते यह प्रश्न है समर्थ का
लेकिन इन सबसे बड़ा एक प्रश्न है .. सिंह होकर गीदड़ो का संस्कार क्योँ ?
जीए तो कुछ इस तरह साक्षी रहे ये जमी ...!!!!
अस्तित्व खरीदने बिकने के लिए नहीं अपने होने को सिद्ध करने के लिए है
हम जिए या मरे यह प्रश्न है व्यर्थ का , हम हारे या जीते यह प्रश्न है समर्थ का
लेकिन इन सबसे बड़ा एक प्रश्न है .. सिंह होकर गीदड़ो का संस्कार क्योँ ?
जीए तो कुछ इस तरह साक्षी रहे ये जमी ...!!!!
दोस्त
"जिसके साथ रहकर हम अपने को सर्वाधिक जान सके.......जो हमारे नैराश्य के तिमिर में आशा की दीपशिखा जला दे........जिसकी प्रफुल्लता हमारी सृजनात्मकता के लिए प्रेरणा बने.........जो हमारे विपत्ति के क्षणों में सहारा बने........कमजोर क्षणों में उत्साह का संचार करे..........जो विश्वास शब्द की गरिमा को कायम रखने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दे......
जीवन के उतार चढाव सुख दुःख में एक ऐसा दोस्त मिल जाये तो ज़िन्दगी ख़ुशी का दरिया लगती है ...
उसमे डूब जाने को जी चाहता है .....!
जीवन के उतार चढाव सुख दुःख में एक ऐसा दोस्त मिल जाये तो ज़िन्दगी ख़ुशी का दरिया लगती है ...
उसमे डूब जाने को जी चाहता है .....!
शनिवार, 31 अक्टूबर 2009

"शाहजंहा के दरबार में तरही मुशायरे की महफिल जमी हुयी थी ......तुकबंदी के साथ सवाल जवाब का दौर चल रहा था ..... !
एक शायर ने शेर अर्ज़ किया -
काफिर है वो दुनिया में, जो बन्दे नहीं इस्लाम के !
इसी महफिल मै उस काल के प्रसिद्ध विद्वान् जग्गनाथ पंडित को यह शेर नागवार गुजरा उन्होंने तुंरत समस्या पूर्ति की -
लाम के मानीन्द है , गेसू मेरे घनश्याम के !
काफिर है वो दुनिया मै जो बन्दे नहीं इस 'लाम' के !!
(लाम - उर्दू भाषा का अक्षर है जिसकी बनावट घुंघराली है !)
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